sherKuch Alfaaz
आसमाँ में कहीं पे वो घर है जिस में रहता हमारा रहबर है जो मुयस्सर नहीं है आँखों को शख़्स हर पल वो दिल के अंदर है अब यहाँ से अकेले जाओ तुम अब यहाँ से ज़मीं बराबर है मुस्कुराने को महफ़िलें हैं सौ दुख सुनाने को उस का ही दर है बेझिझक आओ दिल के मंदिर में देव हो तुम तुम्हारा ही घर है
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