आगाज़-ए-इश्क़ उम्र का अंजाम हो गया नाकामियों के ग़म में मिरा काम हो गया मेरा निशाँ मिटा तो मिटा पर ये रश्क है विर्द-ए-ज़बान-ख़ल्क़ तिरा नाम हो गया दिल चाक चाक नग़्मा-ए-नाक़ूस ने किया सब पारा पारा जामा-ए-एहराम हो गया अब और ढूँडिए कोई जौलाँ-गह-ए-जुनूँ सहरा ब-क़द्र-वुसअत-यक-गाम हो गया। अब हर्फ़-ए-ना-सज़ा में भी उन को दरेग़ है क्यूँ मुझ को जौक़-ए-लज्ज़त-दुश्राम हो गया।
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