यूँँ ही नहीं वो चाँद तकती रहती है लगता है बातें दिल की उस सेे कहती है
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ऐसे मैं ने दोस्तों की रख लीं आन बान हाँ बोला दोस्ती हुई थी दुश्मनी के बा'द में
शामिल मेरा है नाम उन में आप को जो याद है मिलना कभी आ कर हमें फिर,आपसे फ़रियाद है बातें हज़ारों याद आती हैं हमें क्यूँ, क्या पता जो है मगर ये जान लो बस आप के वो बा'द है
शा'इरी का ये हुनर देने का मुझ को शुक्रिया साथ में अंदाज़ अब कुछ सूफियाना चाहिए
ये तेरा इश्क़ ले डूबा, गरम टीले में भी लड़की वगरना क़ैस से पहले बहुत आबाद था सहरा
इश्क़ मैं हासिल कर सकता था फिर सोचा छोड़ो जाने दो
सिर्फ़ तुम से ही नहीं वो ऐसा सब से बोलते हैं मेरे घर के लोग सब के सब अदब से बोलते हैं तुम भड़क क्यूँ जाती हो इस बात से जानाँ सुनो तो तुम को भाभी दोस्त मेरे जाने कब से बोलते हैं
दुनिया की नेमतों से है बेज़ार ज़िंदगी अब देखती है जीने के आसार ज़िंदगी
बदन बना है बर्फ़ का अभी अभी मेरी ओ जाँ तू पास आ गले लगा के सर्दियों को जून कर
बात करने की कोई तो वज़ह दे दो दिल में अपने ही थोड़ी सी जगह दे दो
'होप' कैसे तुझ को बतलाऊँ मैं जब भी तुझ सेे मिल कर लौटा कितने तीर चले हैं मुझ पर कितने सपने चाक हुए हैं कैसे मैं ने ख़ुद को समेटा कैसे तुझ सेे ज़ख़्म छुपाएँ लम्हा-लम्हा मौसम-मौसम इक वहशत थी तारी मुझ पर एक चुभन सी साथ थी हर दम लेकिन फिर भी तुझ सेे मिलने हँसते हँसते आ जाता हूँ
"लड़के" खड़े रहे वो हमेशा बिना शिकायत के किसी की हाँ के लिए मतलबी जहाँ के लिए किसी के प्यार में भी बरसों इंतिज़ार में भी कभी वफ़ा के लिए तो कभी सज़ा के लिए ग़मों के मारे हुए ज़िंदगी से हारे हुए यूँ ही गुमाँ के लिए यारी में जबाँ के लिए खड़े रहे वो हमेशा बिना शिकायत के
"अफ़सोस-2" मोहब्बत में तुम्हें जब उम्र भर का साथ चुभता है अगर ये इश्क़ भी मेरा महज़ इक झूठ लगता है तुम अपनी शाइरी को भी मेरी ग़लती बताते हो तो फिर बोलो कि मुझ से तुम मोहब्बत क्यूँ जताते हो कहो किस हक़ से अब मुझ से कोई भी चाह है तुमको बताओ क्यूँ मेरी ख़ुशियों की यूँ परवाह है तुम को चलो छोड़ो कहा तुम ने जो सब कुछ मानती हूँ मैं मेरा जो हाल होना है ब-ख़ूबी जानती हूँ मैं मुबारक हो तुम्हारी याद में मैं रोज़ जलती हूँ मोहब्बत वाकई अफ़सोस है अब मैं समझती हूँ
"बचपन" उम्र की इस दहलीज़ पे यूँँ भोलेपन में रहना है ऐ ज़िन्दगी मुझे अब भी उसी बचपन में रहना है ना-समझी के वो सारे क़िस्से और वो कहानियाँ सच्ची थीं उस दौर की बातें भी तो इस दौर से अच्छी थीं मीठी यादों के साए लिए आँखों के दर्पण में रहना है ऐ ज़िन्दगी मुझे अब भी उसी बचपन में रहना है
"मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है" तू सब सेे जुदा है तू सब सेे हसीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है ज़माने में तुझ सेा न कोई कहीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे देख कर ही निकलता है सूरज तुझे देख कर रोज़ ढलता है सूरज तू इक बा-वज़ू अप्सरा है मिरी जाँ ख़ुदा भी तो तुझ पे फ़िदा है मिरी जाँ तुझी से मोहब्बत करेगा यक़ीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है तुझे काम सब छोड़ कर देखते हैं बिना बात के फूल भी फेंकते हैं कि मुम्ताज़ भी तेरे जैसी नहीं है यहाँ एक तू ही महा-सुंदरी है बहुत ख़ूब-सूरत है ज़ोहरा-जबीं है मगर तुझ को इस की ख़बर ही नहीं है
"हार्ट अटैक तू लावेगी" जो टॉप पहन के आएगी तो क़हर क़सम से ढाएगी यूँँ तंग क़बा में आवेगी फिर बिजली ख़ूब गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी झुक के रूमाल उठाएगी एकाध को तू टपकाएगी जो ऐसे पेट दिखाएगी तो दिल की नींव हिलाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी यूँँ देखके तू मुस्काएगी तो झगड़ा सब में कराएगी तू हम को भी मरवाएगी तू हम को भी मरवाएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी जो हम सेे हाथ मिलाएगी तो दिल के तार भिड़ाएगी तू तन में आग लगाएगी हम को तू मार गिराएगी और हार्ट अटैक भी लाएगी
“अजब सादा सा लड़का था” अजब सादा-सा लड़का था जो मेरे साथ पढ़ता था उसे ग़म भी थे लेकिन वो सदा हँसता ही रहता था किसी के साथ भी जाऊँ कभी रोका नहीं उस ने उसे मैं दोष जो भी दूँ कभी टोका नहीं उस ने सदा बस प्यार की बातें किया करता था वो मुझ सेे मेरे कपड़े हटा कर तिल कभी देखा नहीं उस ने बहुत इज़्ज़त मुझे देता अदब से बात करता था बयाँ मैं कर नहीं सकती वो मुझ पे कितना मरता था मुझे वो एक माँ जैसे सलीक़े सब सिखाता था दुपट्टा इस तरह ओढ़ो मुझे ये भी बताता था शरारत में अगर होता मेरी चीज़ें छुपा देता अगर मैं रूठने लगती मुझे सीने लगा लेता मेरे बालों को सुलझा कर मेरी चोटी बनाता था किसी दादी के जैसे वो कहानी भी सुनाता था अजब सादा-सा लड़का था जो मेरे साथ पढ़ता था
माँ मेरी ख़्वाहिश मेरी माता मेरा जीवन मेरी माता अगर आया हूँ दुनिया में वो ज़रिया हैं मेरी माता जो मेरी बात करती हैं ज़माने से भी लड़ जाऍं मुझे दर्पण दिखाती हैं ग़लत क्या है सही क्या है मुझे ग़ुस्सा दिखाती हैं मुझे पुचकारती भी हैं मगर दिल की वो सच्ची हैं वो जग में सब सेे अच्छी हैं मेरे अरमान के ख़ातिर वो आधी पेट खाती है वो ख़ुद का ग़म छुपाती हैं मुझे हँस के दिखाती हैं उन्हें उम्मीद है मुझ सेे करूँँगा नाम मैं रौशन बनूँगा शान मैं उन का उन्हीं के राह पे चल कर कभी जो टूट जाता हूँ सफ़र में छूट जाता हूँ वही इक हाथ देती हैं मुझे गिरने नहीं देती वो कहती हैं मेरे बेटे करो मेहनत रखो हिम्मत करो कोशिश सदा हरदम अभी उम्मीद मत हारो ज़रा सी आँधियाँ हैं ये तुम्हारा क्या बिगाड़ेंगी यक़ीनन चंद लम्हों में तुम्हें मंज़िल बुलाएगी वही जो दूर है तुम सेे वही फिर पास आएँगे जो रिश्ता तोड़ बैठे हैं वही अपना बुलाएँगे समय का खेल है सब कुछ समय ही सब बताएगा क़दम रोको नहीं इक दिन यही मंज़िल दिलाएगा भला कैसे बता रंजन ग़लत का रास्ता चुनता हाँ माँ के आँख में आँसू भला क्या देख सकता है
"सदा-ए-मुफ़लिस" मैं देने के लाएक़ नहीं कुछ किसी को सो अपने बदन की क़बा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरी ज़िंदगी की दुआ करने वालों तुम्हें आख़िरी मैं दुआ दे रहा हूँ मुबारक हो सब को ख़ुशी का ठिकाना ये महफ़िल ख़ुशी की तुम्हें दे रहा हूँ मिरे पास खाने को कुछ भी नहीं है सभी के लिए ये जवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ अरे मत करो कोई एहसान मुझ पर उतारूँगा कैसे ये एहसान लोगों मुझे उम्र-भर गालियाँ दोगे फिर सब हमेशा रहोगे परेशान लोगों ज़रूरत नहीं कुछ भी देने की मुझ को मैं तुम को तुम्हारी वफ़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मुझे कोई ख़ुश रहने की मत दुआ दो ये ग़म ही मिरी ज़िंदगी बन गया है मुझे दर्द-ए-दिल ही सभी लोग देना यही तो मिरी बंदगी बन गया है मिरी ज़िंदगी आग का एक गोला है ऐसे में तुझ को हवा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कभी तो मिलेगी मुझे मेरी मंज़िल यही सोच कर के चला जा रहा हूँ मुझे कुछ न लेना न देना किसी से ज़माने में सब सेे मैं तन्हा रहा हूँ मैं दुश्मन हूँ सबका मगर देख फिर भी सभी के लिए दिल में जा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ कोई ये न कहना कभी उन सेे जा कर कि ज़ख़्मों को कैसे मैं अब सी रहा हूँ अगर हाल मेरा कोई तुम सेे पूछे तो कहना यही पी के मैं जी रहा हूँ अब इस सेे ज़ियादा नहीं देने को कुछ तुम्हें अपना रंग-ए-नशा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ ये दिल की सदा है इसे दिल से सुनना कहीं भी न फिर ये दुबारा मिलेगी मिरी ज़िंदगी मुफ़लिसी में कटी है इसी में कटेगी इसी में कटेगी मिरे हाल पर कोई रोना नहीं मैं बस ऐसे ही ख़ुद को सज़ा दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ मिरे पास जाँ के सिवा कुछ नहीं है जिसे दे रहा हूँ यही दे रहा हूँ मैं सब जानता हूँ मुझे मत सिखाओ मैं जो दे रहा हूँ सही दे रहा हूँ अमीरों की औक़ात के जो है बाहर फ़क़ीरों को मैं वो अता दे रहा हूँ मुझे भी तो देते हुए शर्म आती है परियों की रानी को क्या दे रहा हूँ
घर घर क्या होता है ये वो कमरों से बना हुआ चौखाना है क्या जिस के एक कमरे की अटारी में सूखे हुए गुलदस्ते रक्खे हुए हैं और नए फूल वास में इंतिज़ार कर रहे हैं उन के साथ मिल जाने का
हमें भी काम बहुत है ख़ज़ाने से उस के ज़रा ये लोग तो उट्ठें सिरहाने से उस के यही न हो कि तवज्जोह हटा ले वो अपनी ज़ियादा देर न बचना निशाने से उस के वो मुझ से ताज़ा मोहब्बत पे राज़ी है लेकिन उसूल अब भी वही हैं पुराने से उस के वो तीर इतनी रिआयत कभी नहीं देता ये ज़ख़्म लगता नहीं है घराने से उस के वो चढ़ रहा था जुदाई की सीढ़ियाँ 'ख़ुर्रम' सरक रहा था मिरा हाथ शाने से उस के
यूँ मैं दिल का ख़याल रखता हूँ इस में तेरा ख़याल रखता हूँ तेरी मर्ज़ी का भी ख़याल नहीं तेरा इतना ख़याल रखता हूँ और मर जाता है वही बीमार जिस का अच्छा ख़याल रखता हूँ तुझ को फिर भी ख़राब होना है फिर भी तेरा ख़याल रखता हूँ
बे-हद बेचैनी है लेकिन मक़्सद ज़ाहिर कुछ भी नहीं पाना खोना हँसना रोना क्या है आख़िर कुछ भी नहीं अपनी अपनी क़िस्मत सब की अपना अपना हिस्सा है जिस्म की ख़ातिर लाखों सामाँ रूह की ख़ातिर कुछ भी नहीं उस की बाज़ी उस के मोहरे उस की चालें उस की जीत उस के आगे सारे क़ादिर माहिर शातिर कुछ भी नहीं उस का होना या ना होना ख़ुद में उजागर होता है गर वो है तो भीतर ही है वर्ना ब-ज़ाहिर कुछ भी नहीं दुनिया से जो पाया उस ने दुनिया ही को सौंप दिया ग़ज़लें नज़्में दुनिया की हैं क्या है शाइ'र कुछ भी नहीं
मिटने वाली हसरतें ईजाद कर लेता हूँ मैं जब भी चाहूँ इक जहाँ आबाद कर लेता हूँ मैं मुझ को इन मजबूरियों पर भी है इतना इख़्तियार आह भर लेता हूँ मैं फ़रियाद कर लेता हूँ मैं हुस्न बे-चारा तो हो जाता है अक्सर मेहरबाँ फिर उसे आमादा-ए-बे-दाद कर लेता हूँ मैं तू नहीं कहता मगर देख ओ वफ़ा-ना-आश्ना अपनी हस्ती किस क़दर बर्बाद कर लेता हूँ मैं हाँ ये वीराना ये दिल ये आरज़ूओं का मज़ार तुम कहो तो फिर इसे आबाद कर लेता हूँ मैं जब कोई ताज़ा मुसीबत टूटती है ऐ 'हफ़ीज़' एक आदत है ख़ुदा को याद कर लेता हूँ मैं
रौंदी हुई है कौकबा-ए-शहरयार की इतराए क्यूँँ न ख़ाक सर-ए-रहगुज़ार की जब उस के देखने के लिए आएँ बादशाह लोगों में क्यूँँ नुमूद न हो लाला-ज़ार की भूके नहीं हैं सैर-ए-गुलिस्ताँ के हम वले क्यूँँकर न खाइए कि हवा है बहार की
चुप भी हो बक रहा है क्या वाइज़ मग़्ज़ रिंदों का खा गया वाइज़ तेरे कहने से रिंद जाएँगे ये तो है ख़ाना-ए-ख़ुदा वाइज़ अल्लाह अल्लाह ये किब्र और ये ग़ुरूर क्या ख़ुदा का है दूसरा वाइज़ बे-ख़ता मय-कशों पे चश्म-ए-ग़ज़ब हश्र होने दे देखना वाइज़ हम हैं क़हत-ए-शराब से बीमार किस मरज़ की है तू दवा वाइज़ रह चुका मय-कदे में सारी उम्र कभी मय-ख़ाने में भी आ वाइज़ हज्व-ए-मय कर रहा था मिम्बर पर हम जो पहुँचे तो पी गया वाइज़ दुख़्त-ए-रज़ को बुरा मिरे आगे फिर न कहना कभी सुना वाइज़ आज करता हूँ वस्फ़-ए-मय मैं 'अमीर' देखूँ कहता है इस में क्या वाइज़
कहीं न ऐसा हो अपना वक़ार खा जाए ख़िज़ाँ से फूल बचाएँ बहार खा जाए हमारे जैसा कहाँ दिल किसी का होगा भला जो दर्द पाले रखे और क़रार खा जाए पलट के संग तिरी और फेंक सकता हूँ कि मैं वो क़ैस नहीं हाँ जो मार खा जाए उसी का दाख़िला इस दश्त में करो अब से जो सब्र पी सके अपना ग़ुबार खा जाए बहुत क़रार है थोड़ी सी बे-क़रारी दे कहीं न ऐसा हो मुझ को क़रार खा जाए अजब सफ़ीना है ये वक़्त का सफ़ीना भी जो अपनी गोद में बैठा सवार खा जाए
वो लौट आई है ऑफ़िस से हिज्र ख़त्म हुआ हमारे गाल पे इक किस से हिज्र ख़त्म हुआ फिर एक आग लगी जिस में वस्ल की थी चमक ख़याल-ए-यार की माचिस से हिज्र ख़त्म हुआ था बज़्म-ए-दुनिया में मुश्किल हमारा मिलना सो निकल के आ गए मज्लिस से हिज्र ख़त्म हुआ भली शराब है ये वस्ल नाम है उस का बस एक जाम पिया जिस से हिज्र ख़त्म हुआ तुम्हारे हिज्र में सौ वस्ल से गुज़र कर भी ये सोचता हूँ कहाँ किस से हिज्र ख़त्म हुआ
हमारे साथ कोई मसअला फुरात का है वगरना इल्म उसे अपनी मुश्किलात का है मेरे हिसाब से माज़ुरी हुस्न है मेरा अगर ये ऐब है तो भी ख़ुदा के हाथ का है इक आधे काम के ह़क़ में तो ख़ैर मैं भी हूँ तुम्हारे पास तो दफ़्तर शिफारिशात का है हमारी बात का जितना वसीअ पहलू है ज़बाँ पे लाने में नुक़सान काइनात का है हम उस के होने ना होने पे कितना लड़ रहे हैं किसी के वास्ते ये खेल नफ्सियात का है
छोटे छोटे कई बे-फ़ैज़ मफ़ादात के साथ लोग ज़िंदा हैं अजब सूरत-ए-हालात के साथ फ़ैसला ये तो बहर-हाल तुझे करना है ज़ेहन के साथ सुलगना है कि जज़्बात के साथ गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ अब के ये सोच के तुम ज़ख़्म-ए-जुदाई देना दिल भी बुझ जाएगा ढलती हुई इस रात के साथ तुम वही हो कि जो पहले थे मिरी नज़रों में क्या इज़ाफ़ा हुआ इन अतलस ओ बानात के साथ इतना पसपा न हो दीवार से लग जाएगा इतने समझौते न कर सूरत-ए-हालात के साथ भेजता रहता है गुम-नाम ख़तों में कुछ फूल इस क़दर किस को मोहब्बत है मिरी ज़ात के साथ