अब मजीद उस सेे ये रिश्ता नहीं रखा जाता जिस से इक शख़्स का परदा नहीं रखा जाता एक तो बस में नहीं तुझ से मुहब्बत न करूँ और फिर हाथ भी हल्का नहीं रखा जाता पढ़ने जाता हूँ तो तस्में नहीं बांदे जाते घर पलटता हूँ तो बस्ता नहीं रखा जाता दर-ओ-दीवार पे जंगल का गुमाँ होता है मुझ से अब घर में परिंदा नहीं रखा जाता
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