Kuch Alfaaz

जब रोजी रोटी कपड़ा और मकान गया क्या इश्क़ की फ़ितरत होती है मैं जान गया मैं सत्य अहिंसा के रस्ते पर निकला था पहले तो आँखें फिर ज़बान फिर कान गया बाक़ी क़ब्रों की मुझ सेे शिक़ायत जाएज़ थी मरने के बा'द भी देर से क्यूँ शमशान गया उस झुमके वाली का जब मैं ने नाम सुना ख़ुद ग्राहक कैसे बिकते हैं ये जान गया बस बीस रुपए थी क़ीमत उस के झुमके की बिकते हैं आशिक़ सस्ते में मैं मान गया

SHIV SAFAR
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