Kuch Alfaaz

अब तिरी याद से वहशत नहीं होती मुझ को ज़ख़्म खुलते हैं अज़िय्यत नहीं होती मुझ को अब कोई आए चला जाए मैं ख़ुश रहता हूँ अब किसी शख़्स की आदत नहीं होती मुझ को ऐसा बदला हूँ तिरे शहर का पानी पी कर झूट बोलूँ तो नदामत नहीं होती मुझ को है अमानत में ख़यानत सो किसी की ख़ातिर कोई मरता है तो हैरत नहीं होती मुझ को तू जो बदले तिरी तस्वीर बदल जाती है रंग भरने में सुहूलत नहीं होती मुझ को अक्सर औक़ात मैं ता'बीर बता देता हूँ बाज़ औक़ात इजाज़त नहीं होती मुझ को इतना मसरूफ़ हूँ जीने की हवस में 'शाहिद' साँस लेने की भी फ़ुर्सत नहीं होती मुझ को

Shahid Zaki
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