Kuch Alfaaz

अब वो अगला सा इल्तिफ़ात नहीं जिस पे भूले थे हम वो बात नहीं मुझ को तुम से ए'तिमाद-ए-वफ़ा तुम को मुझ से पर इल्तिफ़ात नहीं रंज क्या क्या हैं एक जान के साथ ज़िंदगी मौत है हयात नहीं यूँँही गुज़रे तो सहल है लेकिन फ़ुर्सत-ए-ग़म को भी सबात नहीं कोई दिल-सोज़ हो तो कीजे बयाँ सरसरी दिल की वारदात नहीं ज़र्रा ज़र्रा है मज़हर-ए-ख़ुर्शीद जाग ऐ आँख दिन है रात नहीं क़ैस हो कोहकन हो या 'हाली' आशिक़ी कुछ किसी की ज़ात नहीं

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