Kuch Alfaaz

अभी इस तरफ़ न निगाह कर मैं ग़ज़ल की पलकें संवार लूँ मिरा लफ़्ज़ लफ़्ज़ हो आईना तुझे आइने में उतार लूँ मैं तमाम दिन का थका हुआ तू तमाम शब का जगा हुआ ज़रा ठहर जा इसी मोड़ पर तेरे साथ शाम गुज़ार लूँ अगर आ समाँ की नुमाइशों में मुझे भी इज़्न-ए-क़याम हो तो मैं मोतियों की दुकान से तिरी बालियाँ तिरे हार लूँ कहीं और बांट दे शोहरतें कहीं और बख़्श दे इज़्ज़तें मिरे पास है मिरा आईना मैं कभी न गर्द-ओ-ग़ुबार लूँ कई अजनबी तिरी राह में मिरे पास से यूँ गुज़र गए जिन्हें देख कर ये तड़प हुई तिरा नाम ले के पुकार लूँ

Bashir Badr
WhatsAppXTelegram
Create Image