अब के मिली शिकस्त मेरी ओर से मुझे जितवा दिया गया किसी कमज़ोर से मुझे अल्फ़ाज़ ढ़ोने वाली इक आवाज़ था मैं बस फिर उस ने सुनके शे'र किया शोर से मुझे तुझ को न पाके ख़ुश हूँ कि खोने का डर नहीं ग़ुरबत बचा रही है हर इक चोर से मुझे जो शाख़ पर हैं तेरे गुज़रने के बावजूद वो फूल चुभ रहे हैं बहुत ज़ोर से मुझे मैं चाहता था और कुछ ऊँचा हो आसमान क़ुदरत ने पंख सौंप दिए मोर से मुझे मैं ने क़ुबूल कर लिया चुप-चाप वो गुलाब जो शाख़ दे रही थी तेरी ओर से मुझे हल्के से उस ने पूछा किसे दूँ मैं अपना दिल मैं मन ही मन में चीख़ा बहुत ज़ोर से "मुझे"
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