Kuch Alfaaz

अच्छा तो तुम ऐसे थे दूर से कैसे लगते थे हाथ तुम्हारे शाल में भी कितने ठंडे रहते थे सामने सब के उस से हम खिंचे खिंचे से रहते थे आँख कहीं पर होती थी बात किसी से करते थे क़ुर्बत के उन लम्हों में हम कुछ और ही होते थे साथ में रह कर भी उस से चलते वक़्त ही मिलते थे इतने बड़े हो के भी हम बच्चों जैसा रोते थे जल्द ही उस को भूल गए और भी धोके खाने थे

Shariq Kaifi
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