Kuch Alfaaz

ऐ ज़िंदगी ये क्या हुआ तू ही बता थोड़ा-बहुत वो भी नाराज़ है मैं भी ख़फ़ा थोड़ा-बहुत मंज़िल हमारी क्या हुई ये किस जहाँ में आ गए अब सोचना पेशा हुआ कहना रहा थोड़ा-बहुत ना-मेहरबां हर रास्ता और बे-वफ़ा इक-इक गली हम खो गए इस शहर में रस्ता मिला थोड़ा-बहुत ये लुत्फ़ मुझ पर किसलिए एहसान का क्या फ़ाइदा अब वक़्त सारा कट चुका, अच्छा-बुरा, थोड़ा-बहुत उस बज़्म से बावस्तगी क्या-क्या दिखाएगी नबील फिर आ गए तुम हार कर जो कुछ भी था थोड़ा-बहुत

Aziz Nabeel
WhatsAppXTelegram
Create Image