Kuch Alfaaz

ऐसे चुप हैं कि ये मंज़िल भी कड़ी हो जैसे तेरा मिलना भी जुदाई की घड़ी हो जैसे अपने ही साए से हर गाम लरज़ जाता हूँ रास्ते में कोई दीवार खड़ी हो जैसे कितने नादाँ हैं तिरे भूलने वाले कि तुझे याद करने के लिए उम्र पड़ी हो जैसे तेरे माथे की शिकन पहले भी देखी थी मगर ये गिरह अब के मिरे दिल में पड़ी हो जैसे मंज़िलें दूर भी हैं मंज़िलें नज़दीक भी हैं अपने ही पाँव में ज़ंजीर पड़ी हो जैसे आज दिल खोल के रोए हैं तो यूँँ ख़ुश हैं 'फ़राज़' चंद लम्हों की ये राहत भी बड़ी हो जैसे

Ahmad Faraz
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