Kuch Alfaaz

ऐसी सर्दी है कि सूरज भी दुहाई माँगे जो हो परदेस में वो किस सेे रज़ाई माँगे अपने हाकिम की फ़क़ीरी पर तरस आता है जो ग़रीबों से पसीने की कमाई माँगे अपने मुंसिफ़ की ज़िहानत पे मैं क़ुर्बान कि जो क़त्ल भी हम हो हमीं से ही वो सफ़ाई माँगे

Rahat Indori
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