Kuch Alfaaz

अजब कश्मकश है अजब है कशाकश ये क्या बीच में है हमारे तुम्हारे ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत ज़रूरत की ख़ातिर मरासिम हैं सारे हैं चारों तरफ़ ही बहुत लोग लेकिन हक़ीक़त में कोई भी अपना नहीं है दिखावा दिखावा सभी कुछ दिखावा दिखावे में जीते हैं सारे के सारे बुलंदी पे जिन को भी देखा ये पाया सभी आसरा ढूँडते फिर रहे हैं किसे सरपरस्ती के क़ाबिल समझिए जिए जा रहे हैं ख़ुद अपने सहारे सभी अपनी अपनी कहे जा रहे हैं हमें हम से छीने लिए जा रहे हैं हमें अपनी ख़ातिर भी रहने दो थोड़ा नहीं कोई अपना सिवा अब हमारे हमें अपनी ज़द में ही रहना पड़ेगा ख़ुदी को ख़ुदी में डुबोना पड़ेगा न आपे से बाहर तू आना समुंदर समुंदर को समझा रहे हैं किनारे फ़क़त दूरियों में ही सारी कशिश है कि नज़दीकियों से भरम टूटते हैं फ़लक पे चमकना है क़िस्मत हमारी ज़मीं से ये कहते हैं टूटे सितारे ये झूटे से रिश्ते ये फ़र्ज़ी से नाते कहाँ तक निभाएँ कहाँ तक निभाएँ बहुत हो चुका बस बहुत हो चुका अब कोई तो बढ़े ये मखोटे उतारे

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