Kuch Alfaaz

अकेला ही चला था मैं अकेले ही सफ़र में हूँ मगर मैं कार - आमद हूँ दुआ में हूँ असर में हूँ ख़ता हो कोई मुझ सेे और लोगों को मिले मौक़ा' संभल कर पैर रखता हूँ ज़माने की नज़र में हूँ ज़हर के हूबहू बातें निकलने का यही कारन ज़हर ही मुझ में है या तो रगो - पै मैं ज़हर में हूँ तू आली है तू ने ही रंक को राजा बनाया है ख़ुदा तू मेरी सुन ले मैं हमेशा से सिफ़र में हूँ कभी सोंचो कि मैं हर बात पर हर बार क्यूँँ राजी मेरी उल्फ़त तुझे खोने से डरता हूँ तो डर में हूँ जो अच्छे दिल के हैं यारों वही गुमनाम रहते हैं मैं झूठा हूँ फ़रेबी हूँ मगर जानाँ ख़बर में हूँ मेरा तो ख़ूब मन करता कि उस के घर को जाऊँ मैं मगर वो ये नहीं कहता चले आओ मैं घर में हूँ

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