Kuch Alfaaz

अपना सारा बोझ ज़मीं पर फेंक दिया तुझ को ख़त लिक्खा और लिख कर फेंक दिया ख़ुद को साकिन देखा ठहरे पानी में जाने क्या कुछ सोच के पत्थर फेंक दिया दीवारें क्यूँँ ख़ाली ख़ाली लगती हैं किस ने सब कुछ घर से बाहर फेंक दिया मैं तो अपना जिस्म सुखाने निकला था बारिश ने फिर मुझ पे समुंदर फेंक दिया वो कैसा था उस को कहाँ पर देखा था अपनी आँखों ने हर मंज़र फेंक दिया

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