Kuch Alfaaz

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं वक़्त के साथ है मिटी का सफ़र सदियों से किस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब सोचते रहते हैं किस राह-गुज़र के हम हैं हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम हर क़लमकार की बे-नाम ख़बर के हम हैं

Nida Fazli
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