Kuch Alfaaz

बड़ा है दुख सो हासिल है ये आसानी मुझे कि हिम्मत ही नहीं कुछ याद करने की मुझे चला आता है चुपके से रज़ाई में मिरी बुरी लगती है सूरज की ये बेबाकी मुझे छुपाता फिर रहा हूँ ख़ुद को मैं किस से यहाँ अगर पहचानने वाला नहीं कोई मुझे गुज़र जाएगी सारी ज़िंदगी उम्मीद में न जीने देगी ये जीने की तय्यारी मुझे अगर कम बोलता हूँ मैं तो क्यूँँ बेचैन हो तुम्हीं से तो लगी है चुप की बीमारी मुझे अचानक कुछ हुआ होता तो कोई बात थी न जाने क्यूँँ हुई इस दर्जा हैरानी मुझे

Shariq Kaifi
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