बहाना कर के वो बिछड़ा था मुझ से या दूजा वाक़ई अच्छा था मुझ से उसे जब जब ज़माना तंग करता वो उस को छोड़ कर लड़ता था मुझ से महीनों फूल भिजवाने पड़े थे वो पहली बार जब रूठा था मुझ से भरोसा फिर किसी पर हो न पाया तुम्हारा आख़िरी रिश्ता था मुझ से बड़ी मुद्दत में फिर से हाथ आया बड़ी उजलत में जो छूटा था मुझ से बुलंदी पर पहुच कर भूल बैठा जो अक्सर सीढियाँ लेता था मुझ से अब उस के बिन भी हँस कर कट रही है कभी इक पल नहीं कटता था मुझ से
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