Kuch Alfaaz

बस एक वक़्त का ख़ंजर मिरी तलाश में है जो रोज़ भेस बदल कर मिरी तलाश में है ये और बात कि पहचानता नहीं है मुझे सुना है एक सितमगर मिरी तलाश में है अधूरे ख़्वाबों से उकता के जिस को छोड़ दिया शिकन-नसीब वो बिस्तर मिरी तलाश में है ये मेरे घर की उदासी है और कुछ भी नहीं दिया जलाए जो दर पर मिरी तलाश में है अज़ीज़ हूँ मैं मुझे किस क़दर कि हर इक ग़म तिरी निगाह बचा कर मिरी तलाश में है मैं एक क़तरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है हुआ करे जो समुंदर मिरी तलाश में है वो एक साया है अपना हो या पराया हो जनम जनम से बराबर मिरी तलाश में है मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में वो मेरे जिस्म से बाहर मेरी तलाश में है मैं जिस के हाथ में इक फूल दे के आया था उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है वो जिस ख़ुलूस की शिद्दत ने मार डाला 'नूर' वही ख़ुलूस मुक़र्रर मिरी तलाश में है

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