Kuch Alfaaz

भीड़ में जब तक रहते हैं जोशीले हैं अलग अलग हम लोग बहुत शर्मीले हैं ख़्वाब के बदले ख़ून चुकाना पड़ता है आँखों के ये खेल बड़े ख़रचीले हैं बीनाई भी क्या क्या धोके देती है दूर से देखो सारे दरिया नीले हैं सहरा में भी गाऊँ का दरिया साथ रहा देखो मेरे पावँ अभी तक गीले हैं

Shariq Kaifi
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