भूल जाना था तो फिर अपना बनाया क्यूँँ था तुम ने उल्फ़त का यक़ीं मुझ को दिलाया क्यूँँ था एक भटके हुए राही को सहारा दे कर झूटी मंज़िल का निशाँ तुम ने दिखाया क्यूँँ था ख़ुद ही तूफ़ान उठाना था मोहब्बत में अगर डूबने से मिरी कश्ती को बचाया क्यूँँ था जिस की ता'बीर अब अश्कों के सिवा कुछ भी नहीं ख़्वाब ऐसा मेरी आँखों को दिखाया क्यूँँ था अपने अंजाम पे अब क्यूँँ हो पशेमान 'सबा' एक बे-दर्द से दिल तुम ने लगाया क्यूँँ था
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