Kuch Alfaaz

बोल पड़ते हैं हम जो आगे से प्यार बढ़ता है इस रवय्ये से मैं वही हूँ यक़ीं करो मेरा मैं जो लगता नहीं हूँ चेहरे से हम को नीचे उतार लेंगे लोग इश्क़ लटका रहेगा पंखे से सारा कुछ लग रहा है बे-तरतीब एक शय आगे पीछे होने से वैसे भी कौन सी ज़मीनें थीं मैं बहुत ख़ुश हूँ आक़-ना में से ये मोहब्बत वो घाट है जिस पर दाग़ लगते हैं कपड़े धोने से

Zia Mazkoor
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