Kuch Alfaaz

चंद गज़ की शहरियत किस काम की उड़ना आता है तो छत किस काम की जब तुम्हें चेहरे बदलने का है शौक़ फिर तुम्हारी असलियत किस काम की पूछने वाला नहीं कोई मिज़ाज इस क़दर भी ख़ैरियत किस काम की हम भी कपड़ों को अगर तरजीह दें फिर हमारी शख़्सियत किस काम की

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