चेहरे पे नूर आए जब हो ख़याल उस का बिन बात मुस्कुराना ये भी कमाल उस का होने लगे हया से रुख़सार लाल मेरे चुपके से कौन मलता रंग-ए-गुलाल उस का बस सोच के उसे फिर ख़ुद में सिमटती हूँ मैं बाँधा नहीं मुझे पर कैसा ये जाल उस का दिल ढूँढ़ता है हरदम मिलने के सौ बहाने कोई मुझे बताए क्या अर्ज़-ए-हाल उस का लब भी न थे हिलाए बोली न कुछ ज़बाँ भी नज़रों से गुफ़्तगू का ऐसा जमाल उस का कहते हैं मर्ज़-ए-उल्फ़त है ला'इलाज लेकिन हर लम्स में अजब सा था इंदिमाल उस का बन बे'नवा 'प्रिया' ने माँगा ख़ुदा से उस को मंज़ूर दिल को कब है रंज-ओ-मलाल उस का
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