दमे-सुख़न ही तबीयत लहू लहू की जाए कोई तो हो कि तिरी जिस सेे गुफ़्तगू की जाए ये नुक़्ता कटते शजर ने मुझे किया ता'लीम कि दुख तो मिलते हैं गर ख़्वाहिश-ए-नमू की जाए क़सीदा-कार-ए-अज़ल तुझ को एतराज़ तो नइँ कहीं कहीं से अगर ज़िन्दगी रफ़ू की जाए मैं ये भी चाहता हूँ इश्क़ का न हो इल्ज़ाम मैं ये भी चाहता हूँ तेरी आरज़ू की जाए मोहब्बतों में तो शिजरे कभी नहीं मज़्कूर तू चाहता है कि मसलक पे गुफ़्तगू की जाए मिरी तरह से उजड़कर बसाएँ शहरे-सुखन जो नक़्ल करनी है मेरी तो हू-ब-हू की जाए
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