Kuch Alfaaz

दिल बुरी तरह से धड़कता रहा वो बराबर मुझे ही तकता रहा रौशनी सारी रात कम ना हुई तारा पलकों पे इक चमकता रहा छू गया जब कभी ख़याल तेरा दिल मेरा देर तक धड़कता रहा कल तेरा ज़िक्र छिड़ गया घर में और घर देर तक महकता रहा उस के दिल में तो कोई मैल न था मैं ख़ुदा जाने क्यूँँ झिझकता रहा मीर को पढ़ते पढ़ते सोया था रात भर नींद में सिसकता रहा

Rahat Indori
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