Kuch Alfaaz

दिन के सीने पे शाम का पत्थर एक पत्थर पे दूसरा पत्थर ये सुना था कि देवता है वो मेरे हक़ ही में क्यूँँ हुआ पथर दाएरे बनते और मिटते थे झील में जब कभी गिरा पत्थर अब तो आबाद है वहाँ बस्ती अब कहाँ तेरे नाम का पत्थर हो गए मंज़िलों के सब राही दे रहा है किसे सदा पत्थर सारे तारे ज़मीं पे गिर जाते ज़ोर से मैं जो फेंकता पत्थर नाम ने काम कर दिखाया है सब ने देखा है तैरता पत्थर तू उसे क्या उठाएगा 'आदिल' 'मीर' तक से न उठ सका पत्थर

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