Kuch Alfaaz

दिल मुझे कुफ़्र आश्ना न करे बंदा बुत का हूँ मैं ख़ुदा न करे काटती है पतंग ग़ैरों की हम से तक्कल तिरे उड़ा न करे सुल्ह मंज़ूर है अगर तुम को आँख अग़्यार से लड़ा न करे क्यूँँ न आँचल दुपट्टे का लटके हो परी-ज़ाद पर लगा न करे है वो बुत अब तो महव-ए-यकताई डर ख़ुदा का न हो तो क्या न करे पढ़े 'नादिर' जो शेर-ए-तर्ज़-ए-जदीद सुन के क्यूँँ ख़ल्क़ वाह-वा न करे

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