Kuch Alfaaz

डोली उठा के ले गए महलों के बादशाह सड़कों से देखते रहे सड़कों के बादशाह उम्मीद की किरण में हर इक खेत जल गए सलफ़ास खा के मर गए खेतों के बादशाह मैं दूसरी ग़ज़ल की तरफ़ चल दिया तो दोस्त पिछली बुलाती रह गई ग़ज़लों के बादशाह आँखों की तख़्त-पोशी तो बीनाई ले गई आँसू बनेंगे देखियो पलकों के बादशाह

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