Kuch Alfaaz

दुख फ़साना नहीं कि तुझ से कहें दिल भी माना नहीं कि तुझ से कहें आज तक अपनी बेकली का सबब ख़ुद भी जाना नहीं कि तुझ से कहें बे-तरह हाल-ए-दिल है और तुझ से दोस्ताना नहीं कि तुझ से कहें एक तू हर्फ़-ए-आश्ना था मगर अब ज़माना नहीं कि तुझ से कहें क़ासिदा हम फ़क़ीर लोगों का इक ठिकाना नहीं कि तुझ से कहें ऐ ख़ुदा दर्द-ए-दिल है बख़्शिश-ए-दोस्त आब-ओ-दाना नहीं कि तुझ से कहें अब तो अपना भी उस गली में 'फ़राज़' आना जाना नहीं कि तुझ से कहें

Ahmad Faraz
WhatsAppXTelegram
Create Image