Kuch Alfaaz

ख़त्म कैसे ज़िंदगी करते कि दुनिया देखती किस के दर पे ख़ुद-कुशी करते कि दुनिया देखती मुफ़लिसी थी और हम थे घर के इकलौते चराग़ वरना ऐसी रौशनी करते कि दुनिया देखती सर्द महरी आप की रिश्ते में हाइल हो गई वरना हम वो आशिक़ी करते कि दुनिया देखती ख़ाक सहरा की उड़ाते फिर रहे हो तुम कहाँ शहर में आवारगी करते कि दुनिया देखती तुम भी 'काशिफ़' फाइलातुन में उलझ कर रह गए सीधे सीधे शा'इरी करते कि दुनिया देखती

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