दुनिया में और वक़्त बिताने का मन नहीं लेकिन ख़ुदा के पास भी जाने का मन नहीं बैठे हैं और ख़ाक हुए जा रहे हैं हम फिर भी तिरे दयार से जाने का मन नहीं मन कह रहा है आज हक़ीक़त करें बयाँ लेकिन तिरे ख़िलाफ़ भी जाने का मन नहीं मजबूर हो के उस से गले मिल रहे हैं हम वो जिस सेे हम को हाथ मिलाने का मन नहीं कर सकता हूँ मैं बंद भी कश्ती का वो सूराख़ पर आज अपनी जान बचाने का मन नहीं इक रोग है जो तुझ को बताना नहीं कभी इक ज़ख़्म है जो तुझ को दिखाने का मन नहीं
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