Kuch Alfaaz

एक इक पल में सुनो सैंकड़ों ग़म काटते हैं ज़िंदगी कटती कहाँ है उसे हम काटते हैं मिल के रहते हैं वतन में सभी हम-साए मगर इस मोहब्बत को सियासत के उधम काटते हैं गुलशन-ए-दहर के हर गुल से महकता गुलशन मिल के हम आइए नफ़रत के अलम काटते हैं आलम-ए-हिज्र में हैं वस्ल की यादों के चराग़ इन्हीं यादों से तिरे हिज्र का ग़म काटते हैं हम ने जो की थी वफ़ा वो ही वफ़ा जुर्म हुई देखिए इस की सज़ा कितने जनम काटते हैं पाक रक्खा है तख़य्युल को इबादत की तरह इतनी जिद्दत से तभी शे'र का ज़म काटते हैं उम्र गुज़री है 'शहाब' अपनी जफ़ाओं के तईं दिल को रह रह के जफ़ाओं के सितम काटते हैं

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