Kuch Alfaaz

इक परिंदा अभी उड़ान में है तीर हर शख़्स की कमान में है जिस को देखो वही है चुप चुप सा जैसे हर शख़्स इम्तिहान में है खो चुके हम यक़ीन जैसी शय तू अभी तक किसी गुमान में है ज़िंदगी संग-दिल सही लेकिन आईना भी इसी चटान में है सर-बुलंदी नसीब हो कैसे सर-निगूँ है कि साएबान में है ख़ौफ़ ही ख़ौफ़ जागते सोते कोई आसेब इस मकान में है आसरा दिल को इक उमीद का है ये हवा कब से बादबान में है ख़ुद को पाया न उम्र भर हम ने कौन है जो हमारे ध्यान में है

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