Kuch Alfaaz

गली से गुज़रा तो देखी है अधखुली खिड़की उदास आँखों से मुझ को निहारती खिड़की कभी जो खिड़की से राहों को मेरी तकता था उसी की राह को अब जैसे देखती खिड़की उसी जगह पे कभी एक चाँद रहता था बनी हुई सी है अब वो अमावसी खिड़की बुझी बुझी सी लगे,खोई खोई रहती है किसे सुनाती भला अपनी बेबसी खिड़की पलट के देख ले इक बार रूठने वाले के बारहा ये सदाएँ लगा रही खिड़की हवा थी तेज़ सो खिड़की को बंद करना पड़ा घुटन हुई ज़रा सी याद आ गई खिड़की खुला था दर तेरा खिड़की खुली भी रहती थी कि अब तो भूले से खुलती नहीं कभी खिड़की वो जिस को देख के सीने में जान आती थी हमारी जान की दुश्मन "मलक" बनी खिड़की

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