Kuch Alfaaz

गरचे कब देखते हो पर देखो आरज़ू है कि तुम इधर देखो इश्क़ क्या क्या हमें दिखाता है आह तुम भी तो इक नज़र देखो यूँँ अरक़ जल्वा-गर है उस मुँह पर जिस तरह ओस फूल पर देखो हर ख़राश-ए-जबीं जराहत है नाख़ुन-ए-शौक़ का हुनर देखो थी हमें आरज़ू लब-ए-ख़ंदाँ सो एवज़ उस के चश्म-ए-तर देखो रंग-रफ़्ता भी दिल को खींचे है एक शब और याँ सहर देखो दिल हुआ है तरफ़ मोहब्बत का ख़ून के क़तरे का जिगर देखो पहुँचे हैं हम क़रीब मरने के या'नी जाते हैं दूर अगर देखो लुत्फ़ मुझ में भी हैं हज़ारों 'मीर' दीदनी हूँ जो सोच कर देखो

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