Kuch Alfaaz

गरजती है बरसती है मनाती है वही लड़की परीशाँ जब भी होता हूँ हँसाती है वही लड़की शिकायत करती है वो भी मगर अंदाज़ ऐसा है लिपटती है गले कस के लगाती है वही लड़की जहाँ में जितनी ख़ूबी हैं मुझे सब उस में दिखती हैं न कोई और मुझ को सिर्फ़ भाती है वही लड़की वो कितनी ख़ूब-सूरत है मैं सब को अब बताऊँगा हुआ है ये मेरे सपनों में आती है वही लड़की हँसी में जब भी कहता हूँ मैं तुम को भूल जाऊँगा रो-रोकर यार तब ग़ुस्सा दिखाती है वही लड़की न जाने क्या क्या कहती है मेरे बीमार होने पर मुझे सच में बहुत बातें सुनाती है वही लड़की

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