Kuch Alfaaz

गँवाई ज़िंदगी जा कर बचानी चाहिए थी बुढ़ापे के लिए मुझ को जवानी चाहिए थी समुंदर भी यहाँ तूफ़ान से डरता नहीं अब फ़ज़ाओं में सताने को रवानी चाहिए थी नज़ाकत से नज़ाकत को हरा सकते नहीं हैं दिखावट भी दिखावे से दिखानी चाहिए थी बचाना था अगर ख़ुद को ज़माने की जज़ा से ख़ला में ज़िंदगी तुझ को बितानी चाहिए थी लगा दो आग हाकिम को जला डालो ज़बाँ से यही आवाज़ पहले ही उठानी चाहिए थी हुकूमत चार दिन की है, अना किस काम की फिर तुझे 'आसिफ़' सख़ावत भी दिखानी चाहिए थी

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