Kuch Alfaaz

गए थे जंग लड़ने जो कई लश्कर नहीं लौटे कई के शव नहीं लौटे कई के सर नहीं लौटे तुम्हारी बात पर आख़िर यक़ीं कर लूँ मगर कैसे कहा था लौट आओगे मगर कह कर नहीं लौटे परिंदे शाम होते ही घर अपने लौट आते हैं हमारी उम्र गुज़री है अभी तक घर नहीं लौटे तबस्सुम ये तेरा मुझ को तुझी तक खींच लाता है तुझे तो ख़ूब चाहा पर तेरे होकर नहीं लौटे हमारे दिल में बस जाओ मोहब्बत सीख जाओगे जो पत्थर दिल भी आए थे वो दिल पत्थर नहीं लौटे

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