Kuch Alfaaz

घर से निकले तो हो सोचा भी किधर जाओगे हर तरफ़ तेज़ हवाएँ हैं बिखर जाओगे इतना आसाँ नहीं लफ़्ज़ों पे भरोसा करना घर की दहलीज़ पुकारेगी जिधर जाओगे शाम होते ही सिमट जाएँगे सारे रस्ते बहते दरिया से जहाँ होगे ठहर जाओगे हर नए शहर में कुछ रातें कड़ी होती हैं छत से दीवारें जुदा होंगी तो डर जाओगे पहले हर चीज़ नज़र आएगी बे-मा'नी सी और फिर अपनी ही नज़रों से उतर जाओगे

Nida Fazli
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