Kuch Alfaaz

गुल-ए-शबाब महकता है और बुलाता है मेरी ग़ज़ल कोई पश्तो में गुनगुनाता है अजीब तौर है उस के मिजाज-ए-शाही का लड़े किसी से भी, आँखें मुझे दिखाता है तुम उस का हाथ झटक कर ये क्यूँ नहीं कहतीं तू जानवर है जो औरत पे हाथ उठाता है

Ali Zaryoun
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