Kuch Alfaaz

हैरान न हो देख मैं क्या देख रहा हूँ बंदे तिरी सूरत में ख़ुदा देख रहा हूँ वो अपनी जफ़ाओं का असर देख रहे हैं मैं मअनी-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा देख रहा हूँ दुज़्दीदा निगाहों से किधर देख रहे हो क्या बात है! ये आज मैं क्या देख रहा हूँ है हुस्न यही शय तो गुमाँ और न कीजे सौदा नहीं मतलूब ज़रा देख रहा हूँ किस तरह न क़ाइल हूँ दुआ-ए-सहरी का उस लब पे तबस्सुम की ज़िया देख रहा हूँ क्यूँँ अर्ज़-ए-वतन तंग है ये बात ही क्या है अब तो फ़क़त इक क़ब्र की जा देख रहा हूँ मर जाने की धमकी हुई तम्हीद-ए-तमाशा मैं ने कहा देख उस ने कहा देख रहा हूँ

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