Kuch Alfaaz

हम तेरे दिल में सुकूनत भी नहीं कर पाए और तेरे शहर से हिजरत भी नहीं कर पाए हम वो महरूम-ए-तमन्ना कि भरी दुनिया में अपने हिस्से की मुहब्बत भी नहीं कर पाए हम नहीं जानते कहते हैं जवानी किस को हम तो बचपन में शरारत भी नहीं कर पाए मेरे दिल में था मुआफ़ी का तसव्वुर लेकिन तुम तो इज़हार-ए-नदामत भी नहीं कर पाए

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