Kuch Alfaaz

हमारे दिल में अब तल्ख़ी नहीं है मगर वो बात पहले सी नहीं है मुझे मायूस भी करती नहीं है यही आदत तिरी अच्छी नहीं है बहुत से फ़ाएदे हैं मस्लहत में मगर दिल की तो ये मर्ज़ी नहीं है हर इक की दास्ताँ सुनते हैं जैसे कभी हम ने मोहब्बत की नहीं है है इक दरवाज़े बिन दीवार-ए-दुनिया मफ़र ग़म से यहाँ कोई नहीं है

Javed Akhtar
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