Kuch Alfaaz

हमारी आँख ने देखे हैं ऐसे मंज़र भी गुलों की शाख़ से लटके हुए थे ख़ंजर भी यहाँ वहाँ के अँधेरों का क्या करें मातम कि इस से बढ़ के अँधेरे हैं दिल के अंदर भी अभी से हाथ महकने लगे हैं क्यूँँ मेरे अभी तो देखा नहीं है बदन को छू कर भी किसे तलाश करें अब नगर नगर लोगों जवाब देते नहीं हैं भरे हुए घर भी हमारी तिश्ना-लबी पर न कोई बूँद गिरी घटाएँ जा चुकीं चारों तरफ़ बरस कर भी ये ख़ून रंग-ए-चमन में बदल भी सकता है ज़रा ठहर कि बदल जाएँगे ये मंज़र भी 'अली' अभी तो बहुत सी हैं अन-कही बातें कि ना-तमाम ग़ज़ल है तमाम हो कर भी

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