Kuch Alfaaz

हर एक शख़्स परेशान-ओ-दर-बदर सा लगे ये शहर मुझ को तो यारो कोई भँवर सा लगे अब उस के तर्ज़-ए-तजाहुल को क्या कहे कोई वो बे-ख़बर तो नहीं फिर भी बे-ख़बर सा लगे हर एक ग़म को ख़ुशी की तरह बरतना है ये दौर वो है कि जीना भी इक हुनर सा लगे नशात-ए-सोहबत-ए-रिंदाँ बहुत ग़नीमत है कि लम्हा लम्हा पुर-आशोब-ओ-पुर-ख़तर सा लगे किसे ख़बर है कि दुनिया का हश्र क्या होगा कभी कभी तो मुझे आदमी से डर सा लगे वो तुंद वक़्त की रौ है कि पाँव टिक न सकें हर आदमी कोई उखड़ा हुआ शजर सा लगे जहान-ए-नौ के मुकम्मल सिंगार की ख़ातिर सदी सदी का ज़माना भी मुख़्तसर सा लगे

WhatsAppXTelegram
Create Image