Kuch Alfaaz

हौसले ज़िंदगी के देखते हैं चलिए कुछ रोज़ जी के देखते हैं नींद पिछली सदी की ज़ख़्मी है ख़्वाब अगली सदी के देखते हैं रोज़ हम इक अँधेरी धुँद के पार क़ाफ़िले रौशनी के देखते हैं धूप इतनी कराहती क्यूँँ है छाँव के ज़ख़्म सी के देखते हैं टुकटुकी बाँध ली है आँखों ने रास्ते वापसी के देखते हैं पानियों से तो प्यास बुझती नहीं आइए ज़हर पी के देखते हैं

Rahat Indori
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