हवा-ए-हिज्र में जो कुछ था अब के ख़ाक हुआ कि पैरहन तो गया था बदन भी चाक हुआ अब उस से तर्क-ए-त'अल्लुक़ करूँँ तो मर जाऊँ बदन से रूह का इस दर्जा इश्तिराक हुआ यही कि सब की कमानें हमीं पे टूटी हैं चलो हिसाब-ए-सफ़-ए-दोस्ताँ तो पाक हुआ वो बे-सबब यूँँही रूठा है लम्हा-भर के लिए ये सानेहा न सही फिर भी कर्ब-नाक हुआ उसी के क़ुर्ब ने तक़्सीम कर दिया आख़िर वो जिस का हिज्र मुझे वज्ह-ए-इंहिमाक हुआ शदीद वार न दुश्मन दिलेर था 'मोहसिन' मैं अपनी बे-ख़बरी से मगर हलाक हुआ
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