Kuch Alfaaz

हिज्र की रात याद आती है फिर वही बात याद आती है तुम ने छेड़ा तो कुछ खुले हम भी बात पर बात याद आती है तुम थे और हम थे चाँद निकला था हाए वो रात याद आती है सुब्ह के वक़्त ज़र्रे ज़र्रे की वो मुनाजात याद आती है हाए क्या चीज़ थी जवानी भी अब तो दिन-रात याद आती है मय से तौबा तो की 'अज़ीज़' मगर अक्सर औक़ात याद आती है

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